दैवी सम्पत्
श्रीमद्भगवद् गीता जी का
सोलहवां अध्याय
दैवासुर-सम्पद् विभागयोग
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श्रीभगवान ने कहा, हे भारत ! निर्भयता, अन्त:करण की शुद्धि,ज्ञान और योग में स्थिति, दान, इंद्रिय -दमन, यज्ञ स्वाध्याय , तप सरलता, अहिंसा ,सत्य,अक्रोध,त्याग, शान्ति, भूतों में दयाभाव, लोभ-लालसा रहित होना , कोमलता , लज्जा,अचंचलता !
" तेज़: क्षमा धृति: शौचमद्रोहो नातिमानिता
भवन्ति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत "
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तेज़ ,क्षमा, धैर्य,पवित्रता, द्रोह न करना, अति अभिमानी न होना ये गुण उसमें होते है जो दैवी सम्पत् सहित जन्मा है ! देवों के जो गुण हो उन्हें दैवी सम्पत् कहा है ! जो मनुष्य अपने ज्ञान और
कर्मयोग आदि गुणों को प्राप्त करके मानुषी स्वभाव से ऊपर , देवरुप हो गया हो उसके ऊपर कहे चिन्ह है !
दूसरे अध्याय का स्थिर बुद्धि मनुष्य आप्त और प्रामाणिक मनुष्य है ! छठे अध्याय का योगारुढ., पूरा कर्मयोगी मनुष्य है ! बारहवें अध्याय का मुक्त मनुष्य, तन,मन,धन से ईश्वरार्पित, परम त्यागी और परमेश्वर का परम प्यारा है ! चौदहवें अध्याय में वर्णित गुणातीत मनुष्य प्रकृति के बंधनों से पार पहुँचा हुआ है , और सोलहवें अध्याय का देवगुणयुक्त मनुष्य शुद्ध देवस्वरुप है!
हे पार्थ! असुरों के अवगुणों के सहित जन्में हुए मनुष्य के ये चिन्ह है -दम्भ-दिखावा करना , घमण्ड ,अभिमान, क्रोध , कठोरता और अज्ञान!
हे पार्थ ! इस लोक में दो प्रकार की प्राणियों की सृष्टियाँ है -देव और अासुर !
असुर स्वभाव वाले मनुष्य , प्रकृति को और निवृत्ति को नही जाना करते ! उनमें न पवित्रता
न आचार और न ही सत्य पाया जाता है ! वे जगत को असत्य, निराधार और ईश्वर रहित कहते है !
इस धारणा को पकड़ कर , नष्ट आत्मा वाले , जगत के शत्रु ,जगत के नाश के लिए तैयार हो जाते है !
वे दम्भ,मान,और अंहकार से युक्त अपवित्र व्रतों वाले , कठिनता से पूर्ण होने वाली कामना का आश्रय लेकर और मोह से झूठे विचारों को ग्रहण करते रहते है !
आशाओं के सैकड़ों पाशों में फँसे हुए , काम और क्रोध में परायण जन , कामनाओं के भोग के लिए अन्याय से धनों के संचयो को करना चाहते है ! उनको रात दिन यही धुन लगी रहती है कि आज मैंने यह प्राप्त कर लिया है, आगे को इस मनोरथ को मैं प्राप्त कर लूँगा ! यह शत्रु तो मैंने मार डाला है और दूसरे शत्रुओं को भी हनन कर दूँगा !
मै सम्पन्न हूँ , मै कुलीन हूँ , कौन दूसरा मेरे जैसा है ! दुविधा के कारण भ्रातियों में पढ़े , मोह के जाल में घिरे हुए और कामना के भोगों में निमग्न मर कर घोर नर्क में जा पड़ते है !
उन द्वेषी , क्रूर अशुभ और नीच मनुष्यों को मै संसार की आसुरी योनियों में बार-बार फैंकता हूँ !
हे कुन्ती के पुत्र ! जन्म जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त हुए , वे मूढ़ जन मुझे न पाकर ही , तब नीच गति को पाते रहते है !
आत्मा को नाश करने वाले नर्क के तीन प्रकार के द्वार है -काम, क्रोध और लोभ ! इन तीनों को छोड़ दें ! हे कोन्तेय ! अंधकार के इन तीनों द्वारों से बचा हुआ मनुष्य , अपने आत्मा का कल्याण करता है तत्पश्चात परम गति को पाता है !
जो जन शास्त्र की बनाई हुई विधि को छोड़कर स्वेच्छा से काम करता है वह सिद्धि को नही प्राप्त करता , न सुख को पाता है और न ही परम गति को ! इसलिए कार्याकार्य की व्यवस्था में तुझे शास्त्र प्रमाण है ! शास्त्र की कही हुई विधि जानकर यहाँ तुझ को कर्म करना ही उचित है !!
जय श्री कृष्ण
श्रीरामशरणम्