सभ्य समाज
ऐसे सभ्य समाज में लौट जाना जिसका अंत परिणाम ही कष्ट है जहां केवल दुख है सब कुछ नश्वर है
ऐसे समाज में सम्मिलित होने की आवश्यकता ही क्या है
उससे प्रभावित होने की आवश्यकता क्या है
जिसे तुम पूर्णता का मार्ग समझते हो उसी यात्रा का अंत उसकी अपूर्णता में है
ऐसे अपूर्ण समाज पर अभिमान कैसा
जहां नियम शोषण का आधार बन जाए और समानता विभाजन का आधार बन जाए
उसे तुम सभ्यता कहते हो